सूत्रकृमि सूक्ष्म, कृमि के समान जीव है जो पतले धागे के समान होते है, जिन्हे सूक्ष्मदर्शी से आसानी से देखा जा सकता है। इनका शरीर लंबा, बेलनाकार व पूरा शरीर खंड रहित का होता है। इनका आकार 0.2 मिमी. से 10 मिमी. तक हो सकता है। आलू में मुख्यत: दो प्रकार के सूत्रकृमियों का प्रकोप देखा गया है।
सूत्रकृमियों का नियंत्रण:
- आलू का सिस्ट (कवचधारी) सूत्रकृमि
लक्षण: आलू में सूत्रकृमियों के प्रकोप से ग्रसित पौधे अपना घनापन खो देते है, पौधे मुरझाये दिखाई देते हैं, उनकी वृद्धि या बढवार रुक जाती है, जिससे पौधे बौने या ठूंठ जैसे दिखाई देते हैं। पत्तियाँ निस्तेज तथा कान्तिहीन रोगी दिखाई देती हैं। केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान के अनुसार इसके प्रकोप से उपज में 65-71% तक हानि संभव है।
- जड़ ग्रन्थि सूत्रकृमि
लक्षण: जड़ ग्रन्थि सूत्रकृमि आलू के पौधों की जड़ों तथा कन्दों को ग्रसित करता है। जड़ों पर चोटी गांठें बन जाती हैं। ग्रसित कन्दों पर मस्से बन जाते हैं।
सूत्रकृमियों का नियंत्रण:- खेत में कवचधारी सूत्रकृमि की पोषी फसलें जैसे टमाटर, मिर्च , बैगन आदि न उगाएँ। वर्ष मे कम से कम एक बार चुकंदर, बंदगोभी, मूली, गाजर, लहसुन आदि फसलों को फसल चक्र मे अपनाएं।
- जड़ ग्रन्थि सूत्रकृमि के लिए मक्का, गेहूं, बाजरा, बीन इत्यादि गैर- पोषी फसलें उगाकर जड़ ग्रन्थि सूत्रकृमि के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
- ग्रसित आलू को बीज के रूप मे प्रयोग न करें।
- तेज गर्मियों में ग्रसित खेत की मिट्टी को जुताई कर खुला छोड़ दें। इससे सूत्रकृमि के लार्वा धूप में सूखकर मर जाते हैं।
- कार्बोफ़्यूरान 3 जी @ 8-10 किलो/ एकड़ खेत में मिलाएँ।
- या फोरेट 10 जी @ 6-8 किलो/ एकड़ की दर से प्रयोग कर सकते हैं।
